Amit Shah Corona Positive huwe

BREAKING : गृहमंत्री अमित शाह हुए कोरोना पॉजिटिव, खुद ट्वीट कर दी जानकारी


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गृहमंत्री अमित शाह कोरोना वायरस पॉजिटिव पाए गए हैं और हॉस्पिटल में एडमिट होने जा रहे हैं. इस बात की जानकारी खुद उन्होंने ट्विटर पर दी है. अमित शाह ने संपर्क में आए लोगों से आइसोलेट होने और जांच कराने के लिए कहा है.


कोरोना के शुरूआती लक्षण दिखने पर मैंने टेस्ट करवाया और रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। मेरी तबीयत ठीक है परन्तु डॉक्टर्स की सलाह पर अस्पताल में भर्ती हो रहा हूँ। मेरा अनुरोध है कि आप में से जो भी लोग गत कुछ दिनों में मेरे संपर्क में आयें हैं, कृपया स्वयं को आइसोलेट कर अपनी जाँच करवाएं।

— Amit Shah 









Ramappa Mandir, रामप्पा मंदिर, आंध्र प्रदेश

#भारत_वर्ष_के_हिन्दू_मंदिर की भव्यता देखो

इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक #Diamond_Electron_Machine ही काट सकती है वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से

अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है।


यहां पर एक #नृत्यांगना की मूर्ति भी है जिसने हाई हील पहनी हुई है

सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है

मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई

मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है

पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है

पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है

यह सब आज के समय में करना असंभव है इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास मशीनरी नहीं थी?

उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी
यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थी जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है

🚩 #देवाधिदेव_महादेव_शिव को समर्पित मंदिर

इस्वी सन १२१३ में वारंगल, आंध्र प्रदेश के #काकतिया_वंश के #महाराजा_गणपति_देव को एक शिव मंदिर बनाने का विचार आया। उन्होनें अपने #शिल्पकार_रामप्पा को ऐसा मंदिर बनाने को कहा जो वर्षों तक टिका रहे. #रामप्पा ने की अथक मेहनत और शिल्प कौशल ने आखिरकार मंदिर तैयार कर दिया. जो दिखने में बहुत ही खूबसूरत था, राजा बहुत प्रसन्न हुए और मंदिर का नाम उन्होने उसी शिल्पी के ही नाम पर रख दिया ” #रामप्पा_मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर हे जिसका नाम भगवान के नाम ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है।

#रामप्पा या #राम_लिंगेश्वर_मंदिर आन्ध्र प्रदेश के वरंगल से 70कि. मी दूर पालम पेट में स्थित है। यह मंदिर 6 फ़ीट ऊँचे मंच (प्लेट फ़ार्म) पर बना हुआ है।

#रामप्पा_मंदिर_आंध्र_प्रदेश

एक आर्यसमाजी और मौलवी के बीच बलि प्रथा और कुर्बानी पे चर्चा

एक आर्यसमाजी और मौलवी के बीच बलि प्रथा और कुर्बानी पे चर्चा


एक दिन प्रोफेसर आर्य एवं मौलाना साहिब की भेंट बाज़ार में हो जाती है।  मौलाना साहिब जल्दी में थे बोले कि ईद आने वाली हैं इसलिए क़ुरबानी देने के लिए बकरा खरीदने जा रहा हूँ। आर्य साहिब के मन में तत्काल उन लाखो निर्दोष बकरों, बैलो, ऊँटो आदि का ख्याल आया जिनकी गर्दनो पर अल्लाह के नाम पर तलवार चला दी जाएगी। वे सब बेकसूर जानवर धर्म के नाम पर क़त्ल कर दिए जायेगे। 

आर्य जी से रहा न गया और वे मौलाना साहिब से बोले कि यह क़ुरबानी मुसलमान लोग क्यों देते हैं?

यूँ तो मौलाना जल्दी में थे पर जब इस्लाम का प्रश्न हो तो समय निकल ही आया।  अपनी लम्बी बकरा दाड़ी पर हाथ फेरते हुए बोले- इसके पीछे एक पुराना किस्सा है।  हज़रत इब्राहीम से एक बार सपने में अल्लाह ने उनकी सबसे प्यारी चीज़ यानि उनके बेटे की क़ुरबानी मांगी। अगले दिन इब्राहीम जैसे ही अपने बेटे इस्माइल की क़ुरबानी देने लगे।  तभी अल्लाह ने उनके बेटे को एक मेढ़े में तब्दील कर दिया और हज़रत इब्राहीम ने उसकी क़ुरबानी दे दी। अल्लाह उन पर बहुत मेहरबान हुआ और बस उसके बाद से हर साल मुसलमान इस दिन को बकर ईद के नाम से मनाते है और इस्लाम को मानने वाले बकरा, मेढ़े, बैल आदि की क़ुरबानी देते हैं।  उस बकरे के मांस को गरीबो में बांटा जाता हैं। इसे जकात कहते है। इससे भारी पुण्य मिलता है। 

आर्य जी- जनाब अगर अनुमति हो तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ?

मौलाना जी – बेशक से

आर्य जी- पहले तो यह कि बकर का असली मतलब गाय होता है। न की बकरा फिर बकरे, बैल, ऊंट आदि की क़ुरबानी क्यों दी जाती हैं ?

दूसरे बकर ईद के स्थान पर इसे गेंहू ईद कहते तो अच्छा होता क्योंकि एक किलो गौशत में तो दस किलो के बराबर गेंहू आ जाता हैं। वो ना केवल सस्ता पड़ता है, अपितु खाने के लिए कई दिनों तक काम आता है। 

आपका यह हजरत इब्राहीम वाला किस्सा कुछ कम जँच रहा है। क्योंकि अगर इसे सही माने तो अल्लाह अत्याचारी होने के साथ साथ क्रूर भी साबित होता है। 
आज अल्लाह किसी मुस्लमान के सपने में क़ुरबानी की प्रेरणा देने के लिए क्यों नहीं आते? क्या आज के मुसलमानों को अपने अल्लाह पर विश्वास नहीं है की वे अपने बेटो की क़ुरबानी नहीं देते ? बल्कि एक निरपराध पशु के कत्ल के गुन्हेगार बनते हैं। यह संभव ही नहीं हैं क्योंकि जो अल्लाह या भगवान प्राणियों की रक्षा करता है। वह किसी के सपने में आकर उन्हें मारने की प्रेरणा देगा। 
आपकी बुद्धि को क्या हो गया है ?  मुसलमानों को तत्काल इस प्रकार का कत्लेआम को बंद कर देना चाहिए। मुसलमानों की किताब कुरान-ए-शरीफ के अल हज 22:37 में कहा गया है-  न उनके मांस अल्लाह को पहुँचते हैं और न उनके रक्त , किन्तु उसे तुम्हारा तकवा (धर्मप्रयाणता) पहुँचता हैं। यही बात अल- अनआम 6:38 में भी कही गई है। हदीसो में भी इस प्रकार के अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ तक की मुसलमानों में सबसे पवित्र समझी जाने वाली मक्का की यात्रा पर किसी भी प्रकार के मांसाहार, यहाँ तक कि जूं तक को मारने की अनुमति नहीं होती हैं। तो फिर अल्लाह के नाम पर इस प्रकार कत्लेआम क्यों होता है?

मौलाना जी- आर्य जी यहाँ तक तो सब ठीक हैं पर मांसाहार करने में क्या बुराई है?

आर्य जी -पहले तो शाकाहार विश्व को भुखमरी से बचा सकता है। आज विश्व की तेजी से फैल रही जनसँख्या के सामने भोजन की बड़ी समस्या है। एक कैलोरी मांस को तैयार करने में 10 कैलोरी के बराबर शाकाहारी पदार्थ की खपत हो जाती है। अगर सारा विश्व मांसाहार को छोड़ दे तो धरती के सिमित संसाधनों का उपयोग सही प्रकार से हो सकता है।  कोई भी भूखा नहीं रहेगा। क्यूंकि दस गुना मनुष्यो का पेट भरा जा सकेगा। अफ्रीका में तो अनेक मुस्लिम देश भुखमरी के शिकार हैं। अगर ईद के नाम की जकात में उन्हें शाकाहारी भोजन दिया जाये तो 10 गुणा लोगों का पेट भरा जा सकता हैं। 

    दूसरे मांसाहार अनेक बीमारियों की जड़ हैं। इससे दिल के रोग, गोउट(Gout), कैंसर जैसे अनेको रोगों की वृद्धि देखी गई हैं।  एक मिथक यह है की मांसाहार खाने से ज्यादा ताकत मिलती है। इस मिथक को पहलवान सुशील कुमार ने विश्व के नंबर एक पहलवान है और पूर्ण रूप से शाकाहारी है तोड़ दिया है। आपसे ही पूछते है की क्या आप अपना मांस किसी को खाने देंगे? नहीं ना तो फिर आप कैसे अन्य का मांस खा सकते हैं?

मौलाना जी – आर्य जी आप शाकाहार की बात कर रहे है तो क्या पौधों में आत्मा नहीं होती हैं? क्या उसे खाने से पाप नहीं लगता है? महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बासु के मुताबिक तो पौधों में जान होती है?

आर्य जी- पोंधो में आत्मा की स्थिति सुषुप्ति की होती हैं। अर्थात सोये हुए के समान, अगर किसी पशु का कत्ल करे तो उसे दर्द होता है, वो रोता है, चिल्लाता है। मगर किसी पोंधे को कभी दर्द होते, चिल्लाते नहीं देखा जाता। जैसे कोमा के मरीज को दर्द नहीं होता है। उसी प्रकार से पोंधो को भी उखाड़ने पर दर्द नहीं होता हैं। उसकी उत्पत्ति खाने के लिए ही ईश्वर ने की है।  जगदीश बासु का कथन सही हैं की पोंधो में प्राण होते हैं पर उसमे आत्मा की क्या स्थिती है और पोंधो को दर्द नहीं होता है। इस बात पर वैज्ञानिक मौन है। सबसे महतव्पूर्ण बात है की शाकाहारी भोजन प्रकृति के लिए हानिकारक नहीं है। कुरान या बाइबिल की मान्यता के अनुसार किसी भी पशु को ईश्वर ने भोजन के लिए पैदा किया है तब तो पशुओं की स्वाभाविक प्रवृति यही होनी चाहिये की वे स्वयं मनुष्य के पास उसका भोज्य पदार्थ बनने के लिए आएं और दूसरे बिना संघर्ष के अपने प्राण दे देने चाहिये?

हिन्दुओ में बलि प्रथा

मौलाना जी- परन्तु हिन्दुओ में कोलकता की काली और गुवहाटी की कामख्या के मंदिर में पशु बलि दी जाती हैं। वेदों में भी हवन आदि में तो पशु बलि का विधान है।
आर्य जी- हिन्दू जो पशु बलि में विश्वास रखते है वे वेदों की आज्ञा के विरुद्ध कार्य कर रहे है। पशु बलि देने से केवल और केवल पाप लगता है। भला किसी को मारकर आपको सुख कैसे मिल सकता है? जहाँ तक वेदों का प्रश्न है मध्यकाल में कुछ अज्ञानी लोगो ने हवन आदि में पशु बलि देना आरंभ कर दिया था। उसे वेद संगत दिखाने के लिए महीधर, सायण आदि ने वेदों के कर्मकांडी अर्थ कर दिए। जिससे पशु बलि का विधान वेदों से सिद्ध किया जा सके। बाद में मैक्समूलर , ग्रिफीथ आदि पाश्चात्य लोगो ने वेदों के उसी गलत निष्कर्षों का अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया। जिससे पूरा विश्व यह समझने लगा की वेदों में पशु बलि का विधान है। आधुनिक काल में ऋषि दयानंद ने जब देखा की वेदों के नाम पर किस प्रकार से घोर प्रपंच किया गया है। तो उन्होंने वेदों का एक नया भाष्य किया जिससे फैलाई गयी भ्रांतियों को मिटाया जा सके।  देखो वेदों में पशु रक्षा के विषय में बहुत सुंदर बात लिखी है-
ऋगवेद ५/५१/१२ में अग्निहोत्र को अध्वर यानि जिसमे हिंसा की अनुमति नहीं है कहा गया है
यजुर्वेद १२/३२ में किसी को भी मारने से मनाही है
यजुर्वेद १६/३ में हिंसा न करने को कहाँ गया है
अथर्ववेद १९/४८/५ में पशुओ की रक्षा करने को कहाँ गया है
अथर्ववेद ८/३/१६ में हिंसा करने वाले को मारने का आदेश है
ऋगवेद ८/१०१/१५ में हिंसा करने वाले को राज्य से निष्काषित करने का आदेश है

इस प्रकार चारो वेदों में अनेको प्रमाण हैं जिनसे यह सिद्ध होता हैं की वेदों में पशु बलि अथवा मांसाहार का कोई वर्णन नहीं है। 

मौलाना जी – हमने तो सुना हैं की अश्वमेध में घोड़े की, अज मेध में बकरे की, गोमेध में गों की और नरमेध में आदमी की बलि दी जाती थी।  
आर्य जी- आपकी शंका अच्छी है। मेध शब्द का अर्थ केवल मात्र मारना नहीं है।  मेधावी शब्द का प्रयोग जिस प्रकार से श्रेष्ठ अथवा बुद्धिमान के लिए किया जाता है उसी प्रकार से मेध शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ कार्यो के लिए किया जाता है। 
 शतपथ 13/1/6/3 एवं 13/2/2/3 में कहा गया हैं की जो कार्य राष्ट्र उत्थान के लिए किया जाये उसे अश्वमेध कहते है।  निघंटु 1/1 एवं शतपथ 13/15/3 के अनुसार अन्न को शुद्ध रखना, संयम रखना, सूर्य की रौशनी से धरती को शुद्ध रखने में उपयोग करना आदि कार्य गोमेध कहलाते हैं। महाभारत शांति पर्व 337/1-2 के अनुसार हवन में अन्न आदि का प्रयोग करना अथवा अन्न आदि की उत्पादन क्षमता को बढ़ाना अजमेध कहलाता है। मनुष्य के मृत शरीर का उचित प्रकार से दाह कर्म करना नरमेध कहलाता है। 

मौलाना जी – हमने तो सुना है की श्री राम जी मांस खाते थे एवं महाभारत वनपर्व 207 में रांतिदेव राजा ने गाय को मारने की अनुमति दी थी। 

आर्य जी- रामायण , महाभारत आदि पुस्तकों में उन्हीं लोगो ने मिलावट कर दी है जो हवन में पशु बलि एवं मांसाहार आदि मानते थे। वेद स्मृति परंपरा से सुरक्षित है इसलिए वेदों में कोई मिलावट नहीं हो सकती। वेदों मे से एक शब्द अथवा एक मात्रा तक को बदला नहीं जा सकता। रामायण में सुंदर कांड स्कन्द 36 श्लोक 41 में स्पष्ट कहा गया है कि श्री राम जी मांस नहीं लेते वे तो केवल फल अथवा चावल लेते है। 

महाभारत अनुशासन पर्व 115/40 में रांतिदेव को शाकाहारी बताया गया है। 
शांति पर्व 261/47 में गाय और बैल को मारने वाले को पापी कहा गया है। इस प्रकार के अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे यह भी सिद्ध होता है की रामायण एवं महाभारत में मांस खाने की अनुमति नहीं हैं। जो भी प्रमाण मांसाहार के समर्थन में मिलते है, वे सभी सब मिलावट हैं। 
मौलाना जी – तो क्या आर्य जी हमे किसी को भी मारने की इजाजत नहीं है?
आर्य जी – बिलकुल नहीं, मौलाना साहिब। यहाँ तक कि कुरान के उस ही अल्लाह को मानना चाहिए जो अहिंसा, सत्य,प्रेम, भाईचारे का सन्देश देता है।  क़ुरबानी, मारना, जलना, घृणा करना, पाप करना आदि सिखाने वाली बातें ईश्वर की नहीं हो सकती। 
हदीस ज़द अल-माद में इब्न क़य्यिम ने कहा है कि “गाय के दूध- घी का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि यह सेहत के लिए फायदेमंद है और गाय का मांस सेहत के लिए नुकसानदायक है"
मौलाना जी- आर्य जी आपकी बातों में दम बहुत है और साथ ही साथ वे मुझे जंच भी रही है। अब मैं जीवन भर मांस नहीं खाऊंगा। ईद पर बकरा नहीं काटूँगा और साथ ही साथ अपने अन्य मुस्लिम भाइयों को भी इस सत्य के विषय में बताऊंगा।  
आर्य जी सही रास्ता दिखने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
एक दिन प्रोफेसर आर्य एवं मौलाना साहिब की भेंट बाज़ार में हो जाती है।  मौलाना साहिब जल्दी में थे बोले कि ईद आने वाली हैं इसलिए क़ुरबानी देने के लिए बकरा खरीदने जा रहा हूँ। आर्य साहिब के मन में तत्काल उन लाखो निर्दोष बकरों, बैलो, ऊँटो आदि का ख्याल आया जिनकी गर्दनो पर अल्लाह के नाम पर तलवार चला दी जाएगी। वे सब बेकसूर जानवर धर्म के नाम पर क़त्ल कर दिए जायेगे। 

आर्य जी से रहा न गया और वे मौलाना साहिब से बोले कि यह क़ुरबानी मुसलमान लोग क्यों देते हैं?

यूँ तो मौलाना जल्दी में थे पर जब इस्लाम का प्रश्न हो तो समय निकल ही आया।  अपनी लम्बी बकरा दाड़ी पर हाथ फेरते हुए बोले- इसके पीछे एक पुराना किस्सा है।  हज़रत इब्राहीम से एक बार सपने में अल्लाह ने उनकी सबसे प्यारी चीज़ यानि उनके बेटे की क़ुरबानी मांगी। अगले दिन इब्राहीम जैसे ही अपने बेटे इस्माइल की क़ुरबानी देने लगे।  तभी अल्लाह ने उनके बेटे को एक मेढ़े में तब्दील कर दिया और हज़रत इब्राहीम ने उसकी क़ुरबानी दे दी। अल्लाह उन पर बहुत मेहरबान हुआ और बस उसके बाद से हर साल मुसलमान इस दिन को बकर ईद के नाम से मनाते है और इस्लाम को मानने वाले बकरा, मेढ़े, बैल आदि की क़ुरबानी देते हैं।  उस बकरे के मांस को गरीबो में बांटा जाता हैं। इसे जकात कहते है। इससे भारी पुण्य मिलता है। 

आर्य जी- जनाब अगर अनुमति हो तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ?

मौलाना जी – बेशक से

आर्य जी- पहले तो यह कि बकर का असली मतलब गाय होता है। न की बकरा फिर बकरे, बैल, ऊंट आदि की क़ुरबानी क्यों दी जाती हैं ?

दूसरे बकर ईद के स्थान पर इसे गेंहू ईद कहते तो अच्छा होता क्योंकि एक किलो गौशत में तो दस किलो के बराबर गेंहू आ जाता हैं। वो ना केवल सस्ता पड़ता है, अपितु खाने के लिए कई दिनों तक काम आता है। 

आपका यह हजरत इब्राहीम वाला किस्सा कुछ कम जँच रहा है। क्योंकि अगर इसे सही माने तो अल्लाह अत्याचारी होने के साथ साथ क्रूर भी साबित होता है। 
आज अल्लाह किसी मुस्लमान के सपने में क़ुरबानी की प्रेरणा देने के लिए क्यों नहीं आते? क्या आज के मुसलमानों को अपने अल्लाह पर विश्वास नहीं है की वे अपने बेटो की क़ुरबानी नहीं देते ? बल्कि एक निरपराध पशु के कत्ल के गुन्हेगार बनते हैं। यह संभव ही नहीं हैं क्योंकि जो अल्लाह या भगवान प्राणियों की रक्षा करता है। वह किसी के सपने में आकर उन्हें मारने की प्रेरणा देगा। 
आपकी बुद्धि को क्या हो गया है ?  मुसलमानों को तत्काल इस प्रकार का कत्लेआम को बंद कर देना चाहिए। मुसलमानों की किताब कुरान-ए-शरीफ के अल हज 22:37 में कहा गया है-  न उनके मांस अल्लाह को पहुँचते हैं और न उनके रक्त , किन्तु उसे तुम्हारा तकवा (धर्मप्रयाणता) पहुँचता हैं। यही बात अल- अनआम 6:38 में भी कही गई है। हदीसो में भी इस प्रकार के अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ तक की मुसलमानों में सबसे पवित्र समझी जाने वाली मक्का की यात्रा पर किसी भी प्रकार के मांसाहार, यहाँ तक कि जूं तक को मारने की अनुमति नहीं होती हैं। तो फिर अल्लाह के नाम पर इस प्रकार कत्लेआम क्यों होता है?

मौलाना जी- आर्य जी यहाँ तक तो सब ठीक हैं पर मांसाहार करने में क्या बुराई है?

आर्य जी -पहले तो शाकाहार विश्व को भुखमरी से बचा सकता है। आज विश्व की तेजी से फैल रही जनसँख्या के सामने भोजन की बड़ी समस्या है। एक कैलोरी मांस को तैयार करने में 10 कैलोरी के बराबर शाकाहारी पदार्थ की खपत हो जाती है। अगर सारा विश्व मांसाहार को छोड़ दे तो धरती के सिमित संसाधनों का उपयोग सही प्रकार से हो सकता है।  कोई भी भूखा नहीं रहेगा। क्यूंकि दस गुना मनुष्यो का पेट भरा जा सकेगा। अफ्रीका में तो अनेक मुस्लिम देश भुखमरी के शिकार हैं। अगर ईद के नाम की जकात में उन्हें शाकाहारी भोजन दिया जाये तो 10 गुणा लोगों का पेट भरा जा सकता हैं। 

    दूसरे मांसाहार अनेक बीमारियों की जड़ हैं। इससे दिल के रोग, गोउट(Gout), कैंसर जैसे अनेको रोगों की वृद्धि देखी गई हैं।  एक मिथक यह है की मांसाहार खाने से ज्यादा ताकत मिलती है। इस मिथक को पहलवान सुशील कुमार ने विश्व के नंबर एक पहलवान है और पूर्ण रूप से शाकाहारी है तोड़ दिया है। आपसे ही पूछते है की क्या आप अपना मांस किसी को खाने देंगे? नहीं ना तो फिर आप कैसे अन्य का मांस खा सकते हैं?

मौलाना जी – आर्य जी आप शाकाहार की बात कर रहे है तो क्या पौधों में आत्मा नहीं होती हैं? क्या उसे खाने से पाप नहीं लगता है? महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बासु के मुताबिक तो पौधों में जान होती है?

आर्य जी- पोंधो में आत्मा की स्थिति सुषुप्ति की होती हैं। अर्थात सोये हुए के समान, अगर किसी पशु का कत्ल करे तो उसे दर्द होता है, वो रोता है, चिल्लाता है। मगर किसी पोंधे को कभी दर्द होते, चिल्लाते नहीं देखा जाता। जैसे कोमा के मरीज को दर्द नहीं होता है। उसी प्रकार से पोंधो को भी उखाड़ने पर दर्द नहीं होता हैं। उसकी उत्पत्ति खाने के लिए ही ईश्वर ने की है।  जगदीश बासु का कथन सही हैं की पोंधो में प्राण होते हैं पर उसमे आत्मा की क्या स्थिती है और पोंधो को दर्द नहीं होता है। इस बात पर वैज्ञानिक मौन है। सबसे महतव्पूर्ण बात है की शाकाहारी भोजन प्रकृति के लिए हानिकारक नहीं है। कुरान या बाइबिल की मान्यता के अनुसार किसी भी पशु को ईश्वर ने भोजन के लिए पैदा किया है तब तो पशुओं की स्वाभाविक प्रवृति यही होनी चाहिये की वे स्वयं मनुष्य के पास उसका भोज्य पदार्थ बनने के लिए आएं और दूसरे बिना संघर्ष के अपने प्राण दे देने चाहिये?

मौलाना जी- परन्तु हिन्दुओ में कोलकता की काली और गुवहाटी की कामख्या के मंदिर में पशु बलि दी जाती हैं। वेदों में भी हवन आदि में तो पशु बलि का विधान है।
आर्य जी- हिन्दू जो पशु बलि में विश्वास रखते है वे वेदों की आज्ञा के विरुद्ध कार्य कर रहे है। पशु बलि देने से केवल और केवल पाप लगता है। भला किसी को मारकर आपको सुख कैसे मिल सकता है? जहाँ तक वेदों का प्रश्न है मध्यकाल में कुछ अज्ञानी लोगो ने हवन आदि में पशु बलि देना आरंभ कर दिया था। उसे वेद संगत दिखाने के लिए महीधर, सायण आदि ने वेदों के कर्मकांडी अर्थ कर दिए। जिससे पशु बलि का विधान वेदों से सिद्ध किया जा सके। बाद में मैक्समूलर , ग्रिफीथ आदि पाश्चात्य लोगो ने वेदों के उसी गलत निष्कर्षों का अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया। जिससे पूरा विश्व यह समझने लगा की वेदों में पशु बलि का विधान है। आधुनिक काल में ऋषि दयानंद ने जब देखा की वेदों के नाम पर किस प्रकार से घोर प्रपंच किया गया है। तो उन्होंने वेदों का एक नया भाष्य किया जिससे फैलाई गयी भ्रांतियों को मिटाया जा सके।  देखो वेदों में पशु रक्षा के विषय में बहुत सुंदर बात लिखी है-
ऋगवेद ५/५१/१२ में अग्निहोत्र को अध्वर यानि जिसमे हिंसा की अनुमति नहीं है कहा गया है
यजुर्वेद १२/३२ में किसी को भी मारने से मनाही है
यजुर्वेद १६/३ में हिंसा न करने को कहाँ गया है
अथर्ववेद १९/४८/५ में पशुओ की रक्षा करने को कहाँ गया है
अथर्ववेद ८/३/१६ में हिंसा करने वाले को मारने का आदेश है
ऋगवेद ८/१०१/१५ में हिंसा करने वाले को राज्य से निष्काषित करने का आदेश है

इस प्रकार चारो वेदों में अनेको प्रमाण हैं जिनसे यह सिद्ध होता हैं की वेदों में पशु बलि अथवा मांसाहार का कोई वर्णन नहीं है। 

मौलाना जी – हमने तो सुना हैं की अश्वमेध में घोड़े की, अज मेध में बकरे की, गोमेध में गों की और नरमेध में आदमी की बलि दी जाती थी।  
आर्य जी- आपकी शंका अच्छी है। मेध शब्द का अर्थ केवल मात्र मारना नहीं है।  मेधावी शब्द का प्रयोग जिस प्रकार से श्रेष्ठ अथवा बुद्धिमान के लिए किया जाता है उसी प्रकार से मेध शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ कार्यो के लिए किया जाता है। 
 शतपथ 13/1/6/3 एवं 13/2/2/3 में कहा गया हैं की जो कार्य राष्ट्र उत्थान के लिए किया जाये उसे अश्वमेध कहते है।  निघंटु 1/1 एवं शतपथ 13/15/3 के अनुसार अन्न को शुद्ध रखना, संयम रखना, सूर्य की रौशनी से धरती को शुद्ध रखने में उपयोग करना आदि कार्य गोमेध कहलाते हैं। महाभारत शांति पर्व 337/1-2 के अनुसार हवन में अन्न आदि का प्रयोग करना अथवा अन्न आदि की उत्पादन क्षमता को बढ़ाना अजमेध कहलाता है। मनुष्य के मृत शरीर का उचित प्रकार से दाह कर्म करना नरमेध कहलाता है। 

मौलाना जी – हमने तो सुना है की श्री राम जी मांस खाते थे एवं महाभारत वनपर्व 207 में रांतिदेव राजा ने गाय को मारने की अनुमति दी थी। 

आर्य जी- रामायण , महाभारत आदि पुस्तकों में उन्हीं लोगो ने मिलावट कर दी है जो हवन में पशु बलि एवं मांसाहार आदि मानते थे। वेद स्मृति परंपरा से सुरक्षित है इसलिए वेदों में कोई मिलावट नहीं हो सकती। वेदों मे से एक शब्द अथवा एक मात्रा तक को बदला नहीं जा सकता। रामायण में सुंदर कांड स्कन्द 36 श्लोक 41 में स्पष्ट कहा गया है कि श्री राम जी मांस नहीं लेते वे तो केवल फल अथवा चावल लेते है। 

महाभारत अनुशासन पर्व 115/40 में रांतिदेव को शाकाहारी बताया गया है। 
शांति पर्व 261/47 में गाय और बैल को मारने वाले को पापी कहा गया है। इस प्रकार के अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे यह भी सिद्ध होता है की रामायण एवं महाभारत में मांस खाने की अनुमति नहीं हैं। जो भी प्रमाण मांसाहार के समर्थन में मिलते है, वे सभी सब मिलावट हैं। 
मौलाना जी – तो क्या आर्य जी हमे किसी को भी मारने की इजाजत नहीं है?
आर्य जी – बिलकुल नहीं, मौलाना साहिब। यहाँ तक कि कुरान के उस ही अल्लाह को मानना चाहिए जो अहिंसा, सत्य,प्रेम, भाईचारे का सन्देश देता है।  क़ुरबानी, मारना, जलना, घृणा करना, पाप करना आदि सिखाने वाली बातें ईश्वर की नहीं हो सकती। 
हदीस ज़द अल-माद में इब्न क़य्यिम ने कहा है कि “गाय के दूध- घी का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि यह सेहत के लिए फायदेमंद है और गाय का मांस सेहत के लिए नुकसानदायक है"
मौलाना जी- आर्य जी आपकी बातों में दम बहुत है और साथ ही साथ वे मुझे जंच भी रही है। अब मैं जीवन भर मांस नहीं खाऊंगा। ईद पर बकरा नहीं काटूँगा और साथ ही साथ अपने अन्य मुस्लिम भाइयों को भी इस सत्य के विषय में बताऊंगा।  
आर्य जी सही रास्ता दिखने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

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शिव मंदिर जहाँ माँ गंगा स्वयं जलाभिषेक करती है, झारखंड

झारखंड के चमत्कारी शिव मंदिर जहाँ गंगा करती है जलाभिषेक


झारखंड के रामगढ़ में एक मंदिर ऐसा भी है जहां भगवान शंकर के शिवलिंग पर जलाभिषेक कोई और नहीं स्वयं मां गंगा करती हैं. मंदिर की खासियत यह है कि यहां जलाभिषेक साल के बारह महीने और चौबीस घंटे होता है. यह पूजा सदियों से चली आ रही है. माना जाता है कि इस जगह का उल्‍लेख पुराणों में भी मिलता है. भक्तों की आस्‍था है कि यहां पर मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है l

झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित इस प्राचीन शिव मंदिर को लोग टूटी झरना के नाम से जानते है. मंदिर का इतिहास 1925 से जुड़ा हुआ है और माना जात है कि तब अंग्रेज इस इलाके से रेलवे लाइन बिछाने का काम कर रहे थे. पानी के लिए खुदाई के दौरान उन्हें जमीन के अन्दर कुछ गुम्बदनुमा चीज दिखाई पड़ा. अंग्रेजों ने इस बात को जानने के लिए पूरी खुदाई करवाई और अंत में ये मंदिर पूरी तरह से नजर आया.शिव भगवान की पूजा होती है l 
मंदिर के अन्दर भगवान भोले का शिव लिंग मिला और उसके ठीक ऊपर मां गंगा की सफेद रंग की प्रतिमा मिली. प्रतिमा के नाभी से आपरूपी जल निकलता रहता है जो उनके दोनों हाथों की हथेली से गुजरते हुए शिव लिंग पर गिरता है. मंदिर के अन्दर गंगा की प्रतिमा से स्वंय पानी निकलना अपने आप में एक कौतुहल का विषय बना हैl


मां गंगा की जल धारा का रहस्‍य...
सवाल यह है कि आखिर यह पानी अपने आप कहा से आ रहा है. ये बात अभी तक रहस्य बनी हुई है. कहा जाता है कि भगवान शंकर के शिव लिंग पर जलाभिषेक कोई और नहीं स्वयं मां गंगा करती हैं. यहां लगाए गए दो हैंडपंप भी रहस्यों से घिरे हुए हैं. यहां लोगों को पानी के लिए हैंडपंप चलाने की जरूरत नहीं पड़ती है बल्कि इसमें से अपने-आप हमेशा पानी नीचे गिरता रहता है. वहीं मंदिर के पास से ही एक नदी गुजरती है जो सूखी हुई है लेकिन भीषण गर्मी में भी इन हैंडपंप से पानी लगातार निकलता रहता हैl

दर्शन के लिए बड़ी संख्‍या में आते हैं श्रद्धालु 
लोग दूर-दूर से यहां पूजा करने आते हैं और साल भर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. श्रद्धालुओं का मानना हैं कि टूटी झरना मंदिर में जो कोई भक्त भगवान के इस अदभुत रूप के दर्शन कर लेता है उसकी मुराद पूरी हो जाती है. भक्त शिवलिंग पर गिरने वाले जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और इसे अपने घर ले जाकर रख लेते हैं. इसे ग्रहण करने के साथ ही मन शांत हो जाता है और दुखों से लड़ने की ताकत मिल जाती है l
ॐ नमः शिवाय🚩
-आरडी. अमरुते

अयोध्या श्री राम मंदिर की पूरी कहानी

अयोध्या राम मंदिर की समय सारणी


बाबर के सैन्य अधिकारी बाक़ी तश्कबन्दी का जन्म ताशकंद में हुआ था। 1526 में वह भी बाबर के साथ हिंदुस्तान पहुँचा। पानीपत में सैन्य अभियान के बाद उसे वर्तमान मप्र के चन्देरी में और फिर वहाँ से अवध में एक सैन्य अभियान के लिए भेजा गया। 

बाबर के आदेश पर भारत में तीन मस्जिदों का निर्माण हुआ था। एक संभल में, एक पानीपत में और एक अयोध्या में।

अयोध्या वाली मस्जिद 1528 में रामकोट के एक मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। प्राचीन काल से ही हिन्दुओं की यह धार्मिक आस्था थी कि उसी मन्दिर का राम चबूतरा ही श्रीराम का जन्मस्थान था। इसलिए उस मस्जिद का ही नाम अब 'मस्जिद-ए-जन्मस्थान' पड़ गया। सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों में वह मस्जिद इसी नाम से दर्ज है।

1530 में बाबर की मौत हो गई, लेकिन मस्जिद और जन्मस्थान को लेकर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष चलता रहा। आगे औरंगजेब ने रामकोट के किले को ढहा दिया। अंग्रेज और मुगल दोनो ही इतिहासकारों ने इस विवादित स्थल के बारे में विस्तार में लिखा है। कुछ इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद भी रहा कि मस्जिद बाबर ने नहीं, बल्कि औरंगजेब ने बनवाई थी, लेकिन इस बात से सब सहमत हैं कि वह मस्जिद एक हिन्दू मन्दिर को तोड़कर ही बनाई गई थी।

1853 में निर्मोही अखाड़े के सशस्त्र साधुओं ने इस परिसर पर आक्रमण करके इसे अपने अधिकार में ले लिया। अगले दो वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। अंततः प्रशासन ने इसमें दखल दिया और वहाँ कोई भी मन्दिर बनाने या उपासना करने पर प्रतिबंध लगा दिया। 1855 में फिर एक दंगा भड़का, जिसके बाद वहाँ एक दीवार बना दी गई। उसके एक तरफ मुसलमान नमाज़ पढ़ते थे और दूसरी तरफ राम  चबूतरे पर हिन्दू पूजा करते थे।

1883 में उस चबूतरे पर हिन्दुओं ने मंदिर बनाने का प्रयास किया, जिसका मुस्लिम पक्ष की ओर से विरोध हुआ। विवाद के कारण 1885 में डिप्टी कमिश्नर ने वहाँ मन्दिर के निर्माण पर रोक लगा दी। इसके विरोध में राम चबूतरे के पुजारी महंत रघुबर दास ने फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दायर किया। बदले में मस्जिद के ट्रस्टी ने भी दावा कर दिया कि वह पूरी जमीन मस्जिद की है। अदालत ने दावा खारिज कर दिया।

इसके खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने अगली अदालत में अपील की। वहाँ के अंग्रेज जज ने भी निचली अदालत का फैसला कायम रखा। जज ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से लिखा कि वह मस्जिद हिन्दुओं के पवित्र स्थल पर बनाई गई है। लेकिन अब उस इतिहास को बदलने में बहुत देर हो चुकी है, इसलिए वहाँ यथास्थिति बनाए रखी जाए।

1934 में अयोध्या के पास शाहजहांपुर गांव में गौहत्या को लेकर एक विवाद हुआ, जिसके बाद अयोध्या में भी हिन्दू-मुस्लिम दंगा भड़क गया। इस दंगे में मस्जिद को घेरने वाली दीवार तोड़ दी गई और एक गुम्बद भी क्षतिग्रस्त हो गया। बाद में अंग्रेज सरकार ने इस सबकी मरम्मत करवाई।

1936 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने राज्य में वक्फ की संपत्तियों के बेहतर रखरखाव और प्रबंधन के लिए मुस्लिम वक्फ कानून लागू किया। उसके अनुसार बाबरी मस्जिद और उसके पास स्थित कब्रिस्तान को सुन्नी वक्फ बोर्ड की संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया। संभवतः यही पहला दस्तावेज था, जिसमें मस्जिद-ए-जन्मस्थान के बजाय इसे बाबरी मस्जिद कहा गया था।

लेकिन मस्जिद का स्वामित्व सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिए जाने के फैसले पर शिया समुदाय ने आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि मीर बाक़ी शिया था, इसलिए मस्जिद पर शियाओं का हक है। अब वक्फ कमिश्नर ने इस विवाद के निपटारे की सुनवाई की और अंततः फैसला सुनाया कि मस्जिद को बनवाने वाला बाबर सुन्नी था, इसलिए मस्जिद पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का अधिकार सही है। शिया सेंट्रल बोर्ड ने अदालत में अपील की, लेकिन 1946 के फैसले में भी अदालत ने सुन्नियों का दावा कायम रखा।

स्वतंत्रता के बाद दिसंबर 1949 में अखिल भारतीय रामायण महासभा नामक एक संस्था ने मस्जिद के बाहर 9 दिन के अखण्ड रामायण का कार्यक्रम आयोजित किया। इसकी समाप्ति के बाद अचानक खबर फैल गई कि मस्जिद में राम और सीता की मूर्तियां प्रकट हो गई हैं। खबर सुनते ही हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लग गया। टकराव की आशंका से नेहरू सरकार ने मस्जिद को विवादित स्थल घोषित करके परिसर में ताला लगवा दिया और उप्र के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पन्त और गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को वहाँ से मूर्तियां हटवाकर मस्जिद खाली करवाने का आदेश दिया। लेकिन फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर के. के. नायर ने दंगों की आशंका से हाथ खड़े कर दिए और मूर्तियां नहीं हटवाई जा सकीं।

कुछ ही दिनों बाद गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के न्यायालय में याचिका लगाई कि हिन्दुओं को वहाँ राम-सीता की पूजा करने दी जाए। फिर 1959 में निर्मोही अखाड़े ने भी एक याचिका दायर करके पूरे परिसर पर अपना दावा जता दिया। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी एक याचिका लगा दी।

अप्रैल 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए जनजागरण अभियान की शुरुआत की। इसके लिए रथयात्रा की योजना बनाई गई थी, लेकिन उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के कारण बीच में कुछ समय के लिए इसे रोकना पड़ा।

इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला पलट दिया। लेकिन इसके कारण अब उन्हें हिन्दू वोटों के नुकसान की चिंता हुई। इसलिए अब हिन्दुओं को खुश करने के लिए रामजन्मभूमि परिसर का ताला खुलवा दिया और वहाँ हिन्दुओं को पूजा-अर्चना करने की अनुमति दे दी।

कांग्रेस हमेशा से भाजपा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाती रहती है, लेकिन वास्तव में सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत राजीव गांधी ने पहले शाहबानो मामले में और फिर अयोध्या में ताले खुलवाकर की थी।

1989 में विश्व हिंदू परिषद को अयोध्या में कारसेवा और शिलान्यास करने की अनुमति मिल गई। उसी दौरान पिछड़े वर्ग के आरक्षण के बारे में मण्डल आयोग की रिपोर्ट आई, जिसे वीपी सिंह की सरकार ने लागू करने की घोषणा की। भाजपा को लगा कि मण्डल आयोग के बहाने सरकार देश को जातियों में और तोड़ना चाहती है, इसलिए लोगों को जोड़ने के लिए उसने राम के नाम का सहारा लिया। आडवाणी जी ने सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किमी की रथयात्रा आरंभ की, जिसे बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी जी को गिरफ्तार करके बीच में ही रुकवा दिया। इसके विरोध में भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई। अयोध्या के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति करते हुए राजीव गांधी के बाद अब वीपी सिंह ने बयान दिया कि मस्जिद को बचाने के लिए वे अपनी सत्ता कुर्बान कर रहे हैं।

1991 में फिर अयोध्या में कारसेवा हुई। इस बार मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने हिन्दू कारसेवकों पर गोलियां चलवाई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। भारतीय मीडिया ने इस घटना को दबाने की पूरी कोशिश की, लेकिन स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कारण यह खबर छुप नहीं सकी। अंततः मुलायम सिंह ने भी सांप्रदायिकता का सहारा लिया और मस्जिद को बचाने के नाम पर लोगों के हत्या कांड को सही ठहराया। इसकी प्रतिक्रिया में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया। आडवाणी जी ने इस पर शर्मिंदगी जताते हुए इसे अपने जीवन का सबसे दुखद दिन कहा।

इस घटना के बाद पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक कई जगह दंगे भड़क गए। मुंबई में दाऊद इब्राहिम के इशारे पर 12 बम विस्फोट हुए, लेकिन मुख्यमंत्री शरद पवार ने जानबूझकर फेक न्यूज़ फैलाते हुए 13 का आंकड़ा बता दिया, ताकि एक पक्ष को बचाया जा सके।

2003 में अदालत के आदेश पर एएसआई ने वहां खुदाई की। उसने अपने रिपोर्ट में बताया कि वहां हजारों साल पुराने हिन्दू मन्दिर के स्पष्ट अवशेष मिले हैं। इस बात की पुष्टि के लिए उसने कुल 1360 प्रमाण भी प्रस्तुत किये। मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध किया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच के बाद एएसआई की रिपोर्ट को सही ठहराया।

सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 2.77 एकड़ के उस विवादित परिसर के तीन हिस्से किये जाएं, जिसमें से एक तिहाई रामलला को, एक तिहाई निर्मोही अखाड़े को और एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंप दिया जाए।

इस फैसले के विरोध में मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया। अगस्त से अक्टूबर 2019 तक पांच जजों की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई की। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि एक ट्रस्ट का गठन करके यह पूरी जमीन हिन्दू मन्दिर के निर्माण के लिए उस ट्रस्ट की सौंप दी जाए और इसके बदले सरकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को पाँच एकड़ भूमि मस्जिद बनाने के लिए आवंटित करे। इस तरह हिन्दुओं को अपने पवित्र स्थल पर मन्दिर बनाने की अनुमति मिल गई और 2.77 एकड़ विवादित भूमि के बदले मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि प्राप्त हो गई और सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा यह विवादित मुकदमा अंततः हल हो गया ।

जय श्री राम...
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1947 में पाकिस्तान में हिन्दुओ के साथ क्या हुआ था

1947 के समय पाकिस्तान में हिन्दुओ सिखों के साथ क्या जुल्म हुआ

 ज़रूर पढ़ियेगा रूह  काँप जायेंगी ॥

पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुए lरेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी l बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,," आज़ादी का तोहफा " रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा l ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की... भयानक बदबू......


सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे l मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं- बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी ... बलात्कार किये बिना.....?


जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी....


डॉक्टर ने पूछा क्यों ???


उन महिलाओं ने जवाब दिया... हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ?


हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे.


"आज़ादी का तोहफा"


जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया, उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की नग्न यात्राएं (धिंड) निकाली गयीं, बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया l


1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये, और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था, उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा जी का आग्रह था... क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए था l


विधि मंडल ने विरोध किया, पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे  दो, नहीं तो मैं मर जाउगा.... 

      एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी, की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं l दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए... क्या यह हिंसा नहीं थी .. अहिंसक आतंकवाद की आड़ में 


दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए l निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...


जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला, गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं l क्योकि... तुम हिन्दू हो....


4000000 हिन्दू भारत में आये थे,ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे क्यों आये यहाँ अपने घर जायदाद बेचकर, वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ??


यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?


कैसा होगा वो मोहनदास करमचन्द गाजी उर्फ़ गंधासुर ... कितना महान ...


जिसने बिना तलवार उठाये ... 35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार करवाया


2 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआऔर उसके बाद यह संख्या 10 करोड़ भी पहुंची l


10 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को खरीदा बेचा गया l


20 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया, तरह तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाओं के बाद


ऐसे बहुत से प्रश्न, वास्तविकताएं और सत्य तथा तथ्य हैं जो की 1947 के समकालीन लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों से छुपाये, हिन्दू कहते हैं की जो हो गया उसे भूल जाओ, नए कल की शुरुआत करो ...


परन्तु इस्लाम के लिए तो कोई कल नहीं .. कोई आज नहीं ...वहां तो दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदलने का ही लक्ष्य है पल.. प्रति पल विभाजन के बाद एक और विभाजन का षड्यंत्र ...


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आपने बहुत से देशों में से नए देशों का निर्माण देखा होगा, U S S R टूटने के बाद बहुत से नए देश बने, जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान आदि ... परन्तु यह सब देश जो बने वो एक परिभाषित अविभाजित सीमा के अंदर बने l


और जब भारत का विभाजन हुआ .. तो क्या कारण थे की पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान बनाए गए... क्यों नही एक ही पाकिस्तान बनाया गया... या तो पश्चिम में बना लेते या फिर पूर्व में l


परन्तु ऐसा नही हुआ .... यहाँ पर उल्लेखनीय है की मोहनदास करमचन्द ने तो यहाँ तक कहा था की पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाना चाहिए, बहुत कम लोगों को ज्ञात है की 1947 के समय में पंजाब की सीमा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र तक होती थी ...


यानी की पाकिस्तान का बोर्डर दिल्ली के साथ होना तय था ... मोहनदास करमचन्द के अनुसार l


नवम्बर 1968 में पंजाब में से दो नये राज्यों का उदय हुआ .. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा l


पाकिस्तान जैसा मुस्लिम राष्ट्र पाने के बाद भी जिन्ना और मुस्लिम लीग चैन से नहीं बैठे ...


उन्होंने फिर से मांग की ... की हमको पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं l


1. पानी के रास्ते बहुत लम्बा सफर हो जाता है क्योंकि श्री लंका के रस्ते से घूम कर जाना पड़ता है l


2. और हवाई जहाज से यात्राएं करने में अभी पाकिस्तान के मुसलमान सक्षम नही हैं l इसलिए .... कुछ मांगें रखी गयीं 1. इसलिए हमको भारत के बीचो बीच एक Corridor बना कर दिया जाए....


2. जो लाहोर से ढाका तक जाता हो ... (NH - 1)


3. जो दिल्ली के पास से जाता हो ...


4. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो ... (10 Miles = 16 KM)


5. इस पूरे Corridor में केवल मुस्लिम लोग ही रहेंगे l


30 जनवरी को गांधी वध यदि न होता, तो तत्कालीन परिस्थितियों में बच्चा बच्चा यह जानता था की यदि मोहनदास करमचन्द 3 फरवरी, 1948 को पाकिस्तान पहुँच गया तो इस मांग को भी ...मान लिया जायेगा l


तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार तो मोहनदास करमचन्द किसी की बात सुनने की स्थिति में था न ही समझने में ...और समय भी नहीं था जिसके कारण हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी को गांधी वध जैसा अत्यधिक साहसी और शौर्यतापूर्ण निर्णय लेना पडा l


हुतात्मा का अर्थ होता है जिस आत्मा ने अपने प्राणों की आहुति दी हो .... जिसको की वीरगति को प्राप्त होना भी कहा जाता है l


यहाँ यह सार्थक चर्चा का विषय होना चाहिए की हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जीने क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा की वो क्या करने जा रहे हैं ?


किसके लिए ये सब कुछ कर रहे हैं ?


उनके इस निर्णय से उनके घर, परिवार, सम्बन्धियों, उनकी जाती और उनसे जुड़े  संगठनो पर क्या असर पड़ेगा ?


घर परिवार का तो जो हुआ सो हुआ .... जाने कितने जघन्य प्रकारों से समस्त परिवार और सम्बन्धियों को प्रताड़ित किया गया l


परन्तु ..... अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले मोहनदास करमचन्द के कुछ अहिंसक आतंकवादियों ने 30 जनवरी, 1948 की रात को ही पुणे में 6000 ब्राह्मणों को चुन चुन कर घर से निकाल निकाल कर जिन्दा जलाया l


10000 से ज्यादा ब्राह्मणों के घर और दुकानें जलाए गए l


सोचने का विषय यह है की उस समय संचार माध्यम इतने उच्च कोटि के नहीं थे, विकसित नही थे ... फिर कैसे 3 घंटे के अंदर अंदर इतना सुनियोजित तरीके से इतना बड़ा नरसंहार कर दिया गया ....


सवाल उठता है की ... क्या उन अहिंसक आतंकवादियों को पहले से यह ज्ञात था की गांधी वध होने वाला है ?


जस्टिस खोसला जिन्होंने गांधी वध से सम्बन्धित केस की पूरी सुनवाई की... 35 तारीखें पडीं l


अदालत ने निरीक्षण करवाया और पाया हुतात्मा पनदिर नाथूराम गोडसे जी की मानसिक दशा को तत्कालीन चिकित्सकों ने एक दम सामान्य घोषित किया l  पंडित जी ने अपना अपराध स्वीकार किया पहली ही सुनवाई में और अगली 34  सुनवाइयों में कुछ नहीं बोले ... सबसे आखिरी सुनवाई में पंडित जी ने अपने शब्द कहे ""


गाँधी वध के समय न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति मांगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी | नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था |इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गाँधी वध के सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायलय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दे दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायलय के समक्ष गाँधी वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं -


1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।


2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।


3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।


4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।


5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।


6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।


7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।


8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।


9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।


10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।


11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।


12. 14-15 जून, 1947  को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।


13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।


14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।


15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।


16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।


उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक देशभक्त सच्चे भारतीय युवक ने गान्धी का वध कर दिया।


न्य़यालय में चले अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-


"नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थींऔर उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।"


तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गान्धी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी?


प्रश्न यह भी उठता है की पंडित नाथूराम गोडसे जी ने तो गाँधी वध किया उन्हें पैशाचिक कानूनों के द्वारा मृत्यु दंड दिया गया परन्तु नाना जी आप्टे ने तो गोली नहीं मारी थी ... उन्हें क्यों मृत्युदंड दिया गया ?


नाथूराम गोडसे को सह अभियुक्त नाना आप्टे के साथ १५ नवम्बर १९४९ को पंजाब के अम्बाला की जेल में मृत्यु दंड दे दिया गया। उन्होंने अपने अंतिम शब्दों में कहा था...


यदि अपने देश के प्रति भक्तिभाव रखना कोई पाप है तो मैंने वो पाप किया है और यदि यह पुन्य हिया तो उसके द्वारा अर्जित पुन्य पद पर मैं अपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ


– पंडित नाथूराम गोडसे


आशा है कि लोग पंडित नाथूराम को समझे व् जानें। प्रणाम हुतात्मा को।


भारत माता की जय


"तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें!


अगर आप नाथूराम गोडसे के समर्थक नही भी हैं  तो भी इस पोस्ट को और तक भी पहुँचाए। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगो तक सच्चाई पहुँचे। निश्चित ही एक दिन सत्य की विजय होगी।

आपके लिए इस मैसेज को फिर से भेजा जा रहा है जो किसी कारणवश इस मैसेज को नही पढ़ पाये थे।


क्या है राफेल का घोटाला और सत्य

क्या है राफेल का घोटाला का आरोप और सत्य

Atal Govt : हमें वायुसेना के लिए 126 लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है ।

Air Force : RFI निकालते हैं ।

Air Force : हमारे अनुसार Rafale बेस्ट लड़ाकू जहाज़ रहेगा ।

UPA : ये Rafale कितने का है ?

France : ₹936 करोड़ का है Rafale.

UPA : हमें ₹526 करोड़ में दे दो ।

France : नही संभव है ।

UPA : हमें, बिना Weapons के, बिना Maintenance के, बिना Spares के, बिना Guarantee के दे दो ।

France : वो सब वैसे भी Additional है ।

UPA : कम Availability Rate हो Rafale का 35%-40% तो भी चलेगा ।

France : वहीं बनवा लो ।

UPA : अच्छा Offset कितना है ?

France : 30% Offset रहेगा ।

UPA : दे दो न प्लीज ₹526 करोड़ में ।

France : नहीं दे सकते बोला न ।

UPA : अच्छा 18 ही दे दो बाकी हम India में बनवा लेंगे ।

France : पर कौन बनाएगा ?

UPA : HAL से बनवा लेंगे India में ।

France : पर HAL तो स्टैण्डर्ड के लिए उतनी Manpower देने को तैयार ही नहीं है ।

UPA : ओह, खैर हमारे पास तो Rafale खरीदने के पैसे ही नहीं हैं ।

NDA : हमें Rafale खरीदने हैं ।

France : जी, बताइये ।

NDA : कितने का पड़ेगा Rafale ?

France : वही ₹936 करोड़ का, लेकिन escalation कॉस्ट बढ़ जाएगी अब ।

NDA : हमें India Specific Changes भी चाहिए ।

France : और ...

NDA : हमें, Weapons पैकेज, Maintenance सपोर्ट, Spare पार्ट्स, Guarantee भी चाहिए ।

France : और ...

NDA : हमें, 75% से ज्यादा Availability Rate चाहिए ।

France : और ...

NDA : हमें Offset भी 50% चाहिए ।

France : फिर तो Cost बहोत ही ज्यादा बढ़ जाएगी ।

NDA : आप कॉस्ट बताइये तो ।

France : फिर तो कॉस्ट करीब ₹1,988 करोड़ पड़ेगी ।

NDA : Offset देंगे 50% ?

France : हाँ, ₹30,000 करोड़ इन्वेस्टमेंट कर देंगे India में Offset के अंतर्गत ।

NDA : ठीक है लेकिन Cost कुछ कम कीजिये ।

France : आप कितने Rafale लेंगे ?

NDA : कॉस्ट कम कर देंगे तो अभी 36 Fly-Away में लेंगे और फिर बाकी India में बनवाएंगे ।

France : India में किससे बनवाएंगे ?

NDA : India में PPP मॉडल पर बनवाएंगे, नया टेंडर निकालेंगे और 110 विमानों का निकलेंगे ।

France : मतलब आप अब 126 की जगह 36 + 110 = 146 लड़ाकू जहाज़ खरीदेंगे ।

NDA : हाँ

France : ठीक है, ₹1,638 करोड़ से कम में नही दे पाएंगे Rafale, डील कब साइन करेंगे ?

NDA : तुरंत । 
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Congress : हाय हाय, हम तो ₹526 करोड़ में खरीद रहे थे Rafale.

Congress : हम Court जाएंगे ।

SC : Modi सरकार की Rafale Deal एकदम क्लीन है ।


Congress : वो Anil Ambani को ₹30,000 करोड़ का Offset दे दिया।

NDA : ₹30,000 के Offset में 100 कंपनियां है, Reliance और Dassault का Offset सिर्फ ₹850 करोड़ का है ।

Congress : पर Rate ज्यादा है, उसका क्या ?

CAG : बेसिक Aircraft 2.86% सस्ता है ।

Congress : हम SC और CAG को नही मानते, हम तो ₹526 करोड़ में खरीद रहे थे Rafale. "हाय हाय"।




❣️🙏

सिख गुरुओ का राम मंदिर, अयोध्या में योगदान

जरा याद करो और गुरुओं का बलिदान

राम मंदिर अपने पुनर्निर्माण की तरफ आगे बढ़ रहा है 5 अगस्त को राम मंदिर की नीव लगने वाली है

गुरुओं का बलिदान
राम मंदिर फैसला आने के बाद उसमें सिख गुरुओं का भी जिक्र किया गया है आज हम उसी के बारे में जानते हैं कि कब कब सिख गुरु अयोध्या आए हैं

पेज नंबर 63 पर एक गवाह ( राजेन्द्र सिंह) के बयान का हवाला दिया है- जिसके मुताबिक गुरुनानक देव जी ने अयोध्या जाकर 1510-11के बीच श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के दर्शन किये थे.

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में गुरुनानक देव जी की अयोध्या यात्रा और श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के दर्शन का जिक्र है. एक जज जिन्होंने 116 पेज में अलग से अपनी राय दर्ज कराई है, उन्होंने पेज नंबर 63 पर एक गवाह ( राजेन्द्र सिंह) के बयान का हवाला दिया है- जिसके मुताबिक गुरुनानक देव जी ने अयोध्या जाकर 1510-11के बीच श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के दर्शन किये थे. अहम बात ये ये समय बाबर के भारत में आक्रमण से (1526) से बहुत पहले का है.. गवाह राजेन्द्र सिंह ने कई "जन्मसाखी" का भी हवाला दिया है जिसमें गुरुनानक देव जी के अयोध्या आगमन और श्रीरामजन्ममन्दिर के दर्शन का जिक्र है. कहा गया है कि बाद में नौंवे गुरु तेगबहादुर जी और दसवें गुरु, गुरु गोबिंदसिंहजी ने भी श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के दर्शन किये थे.
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आपको बता दे कि राजेन्द्र सिंह इलाहाबाद HC में चली सुनवाई में सूट नंबर 4 यानि सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से दायर केस में प्रतिवादी नंबर 2 के गवाह के रूप में पेश हुए थे. उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की कि 1528 में बाबरी मस्जिद के निर्माण होने से पहले से ही गुरुनानक देव जी समेत तमाम तीर्थयात्री अयोध्या आकर रामजन्मभूमि के दर्शन करते रहे है. इलाहाबाद HC के जज सुधीर अग्रवाल ने अपने फैसले में इसका जिक्र किया था.  

                                                  
विवादित ढांचे के अंदर सबसे पहले निहंग सिख ने एंट्री की
इसके अलावा एक और अहम वाकया सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले में दर्ज है. 161 साल पहले विवादित ढांचे के अंदर सबसे पहले घुसकर एंट्री करने वाल भी एक निहंग सिख ही था. कोर्ट के फैसले में पेज नंबर 64 और 799 पर थानेदार शीतल सिंह की ओर से 28 नवंबर 1958 को दर्ज एक शिकायत का हवाला दिया . शिकायत में कहा गया- इस दिन एक निहंग सिख फकीर सिंह खालसा ने विवादित ढांचे के अंदर घुसकर पूजा का आयोजन किया और अंदर श्री भगवान का प्रतीक चिन्ह भी स्थापित किया.उनके साथ 25 और सिख भी मौजूद थे. बाद में बमुश्किल उन्हें हटाया गया.

                                            
जब सिखों ने साधुओं के साथ मिलकर मुगल फौज से लोहा लिया
इतिहास में इस बात का ज़िक्र है कि अयोध्या में गुरु गोबिंद सिंह जी का आगमन बाल्य काल में हुआ था. अयोध्या में मौजूद गुरुद्वारा बृह्मकुण्ड में गुरुगोबिंद सिंह जी के अयोध्या आगमन से जुड़ी तमाम यादे है. इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि श्रीरामजन्मभूमि की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी के निहंग सिखों ने चिमटाधारी साधुओं के मिलकर लोहा लिया था . दरअसल मुगलों की सेना के हमले की खबर जैसे ही चिमटाधारी साधु बाबा वैष्णवदास को लगी तो उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जी से मदद मांगी. गुरु जी ने ​तुरंत अपने सिखों को वहाँ भेजा .गुरुद्वारे में वे हथियार आज भी मौजूद हैं जिनसे मुगल सेना को धूल चटा दी गई थी. मुगलों से लड़ने के लिये सिखों की सेना ने सबसे पहले ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे में ही अपना डेरा जमाया था
.

नमन उन सभी गुरुओं को जिन्होंने धर्म रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया

जय श्री राम 
वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतेह


Questions on Rafael by the Chinese sponsored Left

राफेल लाने से क्या होता है ??

क्या इससे गरीबों की भूख मिट जाएगी ?? क्या देश स्वावलंबी हो जाएगा ?? 

क्या शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा ?? 

क्या गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की स्थिति में सुधार होगा ?? 

क्या देश की अर्थव्यवस्था सुधरेगी ?? 


क्या महामारी से चौपट हुए काम धंधे वापस पटरी पर आ जाएंगे ??

क्या प्रतिभाओं का भारत से पलायन रुक जाएगा ??

क्या विश्वपटल पर भारत की छवि सुधरेगी ??




क्या पर्यावरण में सुधार होंगे ??

क्या देश में साम्प्रदायिक सौहार्दता का माहौल बन पाएगा ??

“उपरोक्त में से कोई भी सवाल कोई आपसे पूछे तो उसे लेदर वाले जूते से मारना.. ठीक है “

राफेल की आप सब को बहुत बहुत बधाई हो ।
वन्दे मातरम......

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How Islam was introduced in Bangladesh

भारतीय इतिहास की भयंकर भूले

काला पहाड़

बांग्लादेश। यह नाम स्मरण होते ही भारत के पूर्व में एक बड़े भूखंड का नाम स्मरण हो उठता है। जो कभी हमारे देश का ही भाग था। जहाँ कभी बंकिम के ओजस्वी आनंद मठ, कभी टैगोर की हृद्यम्य कवितायेँ, कभी अरविन्द का दर्शन, कभी वीर सुभाष की क्रांति ज्वलित होती थी। आज बंगाल प्रदेश एक मुस्लिम राष्ट्र के नाम से प्रसिद्द है। जहाँ हिन्दुओं की दशा दूसरे दर्जें के नागरिकों के समान हैं। क्या बंगाल के हालात पूर्व से ऐसे थे? बिलकुल नहीं। अखंड भारतवर्ष की इस धरती पर पहले हिन्दू सभ्यता विराजमान थी। कुछ ऐतिहासिक भूलों ने इस प्रदेश को हमसे सदा के लिए दूर कर दिया। एक ऐसी ही भूल का नाम कालापहाड़ है। बंगाल के इतिहास में काला पहाड़ का नाम एक अत्याचारी के नाम से स्मरण किया जाता है। काला पहाड़ का असली नाम कालाचंद राय था। कालाचंद राय एक बंगाली ब्राहण युवक था। पूर्वी बंगाल के उस वक्‍त के मुस्लिम शासक की बेटी को उससे प्‍यार हो गया। बादशाह की बेटी ने उससे शादी की इच्‍छा जाहिर की। वह उससे इस कदर प्‍यार करती थी। वह उसने इस्‍लाम छोड़कर हिंदू विधि से उससे शादी करने के लिए तैयार हो गई। ब्राहमणों को जब पता चला कि कालाचंद राय एक मुस्लिम राजकुमारी से शादी कर उसे हिंदू 

चाहता है। तो ब्राहमण समाज ने कालाचंद का विरोध किया। उन्होंने उस मुस्लिम युवती के हिंदू धर्म में आने का न केवल विरोध किया, बल्कि कालाचंद राय को भी जाति बहिष्‍कार की धमकी दी। कालाचंद राय को अपमानित किया गया। अपने अपमान से क्षुब्ध होकर कालाचंद गुस्‍से से आग बबुला हो गया और उसने इस्‍लाम स्‍वीकारते हुए उस युवती से निकाह कर उसके पिता के सिंहासन का उत्‍तराधिकारी हो गया। अपने अपमान का बदला लेते हुए राजा बनने से पूर्व ही उसने तलवार के बल पर ब्राहमणाों को मुसलमान बनाना शुरू किया। उसका एक ही नारा था मुसलमान बनो या मरो। पूरे पूर्वी बंगाल में उसने इतना कत्‍लेआम मचाया कि लोग तलवार के डर से मुसलमान होते चले गए। इतिहास में इसका जिक्र है कि पूरे पूर्वी 

बंगाल को इस अकेले व्‍यक्ति ने तलवार के बल पर इस्‍लाम में धर्मांतरित कर दिया। यह केवल उन मूर्ख, जातिवादी, अहंकारी व हठधर्मी ब्राहमणों को सबक सिखाने के उददेश्‍य से किया गया था। उसकी निर्दयता के कारण इतिहास उसे काला पहाड़ के नाम से जानती है। अगर अपनी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर कुछ हठधर्मी ब्राह्मणों ने कालाचंद राय का अपमान न किया होता तो आज बंगाल का इतिहास कुछ ओर ही होता[i]।

कश्मीर का इस्लामीकरण

कश्मीर: शैव संस्कृति के ध्वजावाहक एवं प्राचीन काल से ऋषि कश्यप की धरती कश्मीर आज मुस्लिम बहुल विवादित प्रान्त के रूप में जाना जाता हैं। 1947 के बाद से धरती पर जन्नत सी शांति के लिए प्रसिद्द यह प्रान्त आज कभी शांत नहीं रहा। इसका मुख्य कारण पिछले 700 वर्षों में घटित कुछ घटनाएँ हैं जिनका परिणाम कश्मीर का इस्लामीकरण होना हैं। कश्मीर में सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करने वाला राजा रिंचन था। 1301 ई. में कश्मीर के राजसिंहासन पर सहदेव नामक शासक विराजमान हुआ। कश्मीर में बाहरी तत्वों ने जिस प्रकार अस्त व्यस्तता फैला रखी थी, उसे सहदेव रोकने में पूर्णत: असफल रहा। इसी समय कश्मीर में लद्दाख का राजकुमार रिंचन आया, वह अपने पैत्रक राज्य से विद्रोही होकर यहां आया था। यह संयोग की बात थी कि इसी समय यहां एक मुस्लिम सरदार शाहमीर स्वात (तुर्किस्तान) से आया था। कश्मीर के राजा सहदेव ने बिना विचार किये और बिना उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लिए इन दोनों विदेशियों को प्रशासन में महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये। यह सहदेव की अदूरदर्शिता थी, जिसके परिणाम आगे चलकर उसी के लिए घातक सिद्घ हुए। तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य को क्रूर आक्रामक की दया पर छोडक़र सहदेव किश्तवाड़ की ओर भाग गया। डुलचू ने हत्याकांड का आदेश दे दिया। हजारों लोग मार डाले गये।कितनी भयानक परिस्थितियों में राजा ने जनता को छोड़ दिया था, यह इस उद्घरण से स्पष्ट हो गया। राजा की अकर्मण्यता और प्रमाद के कारण हजारों लाखों की संख्या में हिंदू लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया। जनता की स्थिति दयनीय थी। राजतरंगिणी में उल्लेख है-‘जब हुलचू वहां से चला गया, तो गिरफ्तारी से बचे कश्मीरी लोग अपने गुप्त स्थानों से इस प्रकार बाहर निकले, जैसे चूहे अपने बिलों से बाहर आते हैं। जब राक्षस डुलचू द्वारा फैलाई गयी हिंसा रूकी तो पुत्र को पिता न मिला और पिता को पुत्र से वंचित होना पड़ा, भाई भाई से न मिल पाया। कश्मीर सृष्टि से पहले वाला क्षेत्र बन गया। एक ऐसा विस्तृत क्षेत्र जहां घास ही घास थी और खाद्य सामग्री न थी।[ii]’

इस अराजकता का सहदेव के मंत्री रामचंद्र ने लाभ उठाया और वह शासक बन बैठा। परंतु रिंचन भी इस अवसर का लाभ उठाने से नही चूका। जिस स्वामी ने उसे शरण दी थी उसके राज्य को हड़पने का दानव उसके हृदय में भी उभर आया और भारी उत्पात मचाने लगा। रिंचन जब अपने घर से ही बागी होकर आया था, तो उससे दूसरे के घर शांत बैठे रहने की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी? उसके मस्तिष्क में विद्रोह का परंपरागत कीटाणु उभर आया, उसने रामचंद्र के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रामचंद्र ने जब देखा कि रिंचन के हृदय में पाप हिलोरें मार रहा है, और उसके कारण अब उसके स्वयं के जीवन को भी संकट है तो वह राजधानी छोडक़र लोहर के दुर्ग में जा छिपा। रिंचन को पता था कि शत्रु को जीवित छोडऩा कितना घातक सिद्ध हो सकता है? इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम किया और अपने कुछ सैनिकों को गुप्त वेश में रामचंद्र को ढूंढने के लिए भेजा। जब रामचंद्र मिल गया तो उसने रामचंद्र से कहलवाया कि रिंचन समझौता चाहता है। वात्र्तालाप आरंभ हुआ तो छल करते हुए रिंचन ने रामचंद्र की हत्या करा दी। इस प्रकार कश्मीर पर रिंचन का अधिकार हो गया। यह घटना 1320 की है। उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी से विवाह कर लिया था। इस प्रकार वह कश्मीर का राजा बनकर अपना राज्य कार्य चलाने लगा। कहते है कि अपने पिता के हत्यारे से विवाह करने के पीछे कोटा रानी का मुख्य उद्देश्य उसके विचार परिवर्तन कर कश्मीर की रक्षा करना था। धीरे धीरे रिंचन उदास रहने लगा। उसे लगा कि उसने जो किया वह ठीक नहीं था। उसके कश्मीर के शैवों के सबसे बड़े धर्मगुरु देवास्वामी के समक्ष हिन्दू बनने का आग्रह किया। देवास्वामी ने इतिहास की सबसे भयंकर भूल करी और बुद्ध मत से सम्बंधित रिंचन को हिन्दू समाज का अंग बनाने से मना कर दिया[iii]। रिंचन के लिए पंडितों ने जो परिस्थितियां उत्पन्न की थी वे बहुत ही अपमानजनक थी। जिससे उसे असीम वेदना और संताप ने घेर लिया। देवास्वामी की अदूरदर्शिता ने मुस्लिम मंत्री शमशीर को मौका दे दिया। उसने रिंचन को सलाह दी की अगले दिन प्रात: आपको जो भी धर्मगुरु मिले। आप उसका मत स्वीकार कर लेना। अगले दिन रिंचन जैसे ही सैर को निकला, उसे मुस्लिम सूफी बुलबुल शाह अजान देते मिला। रिंचन को अंतत: अपनी दुविधा का समाधान मिल गया। उससे इस्लाम में दीक्षित होने का आग्रह करने लगा। बुलबुलशाह ने गर्म लोहा देखकर तुरंत चोट मारी और एक घायल पक्षी को सहला कर अपने यहां आश्रय दे दिया। रिंचन ने भी बुलबुल शाह का हृदय से स्वागत किया। इस घटना के पश्चात कश्मीर का इस्लामीकरण आरम्भ हुआ जो लगातार 500 वर्षों तक अत्याचार, हत्या, धर्मान्तरण आदि के रूप में सामने आया।

यह अपच का रोग यही नहीं रुका। कालांतर में महाराज ;गुलाब सिंह के पुत्र महाराज रणबीर सिंह गद्दी पर बैठे। रणबीर सिंह द्वारा धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर हिन्दू संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। राजा के विचारों से प्रभावित होकर राजौरी पुंछ के राजपूत मुसलमान और कश्मीर के कुछ मुसलमान राजा के समक्ष आवदेन करने आये कि उन्हें मूल हिन्दू धर्म में फिर से स्वीकार कर लिया जाये। राजा ने अपने पंडितों से उन्हें वापिस मिलाने के लिया पूछा तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। एक पंडित तो राजा के विरोध में यह कहकर झेलम में कूद गया की राजा ने अगर उसकी बात नहीं मानी तो वह आत्मदाह कर लेगा। राजा को ब्रह्महत्या का दोष लगेगा। राजा को मज़बूरी वश अपने निर्णय को वापिस लेना पड़ा। जिन संकीर्ण सोच वाले पंडितों ने रिंचन को स्वीकार न करके कश्मीर को 500 वर्षों तक इस्लामिक शासकों के पैरों तले रुंदवाया था। उन्हीं ने बाकि बचे हिन्दू कश्मीरियों को रुंदवाने के लिए छोड़ दिया। इसका परिणाम आज तक कश्मीरी पंडित भुगत रहे हैं[iv]।

पाकिस्तान के जनक जिन्ना और इक़बाल

पाकिस्तान। यह नाम सुनते ही 1947 के भयानक नरसंहार और भारत होना स्मरण हो उठता हैं। महाराज राम के पुत्र लव द्वारा बसाई गई लाहौर से लेकर सिख गुरुओं की कर्मभूमि आज पाकिस्तान के नाम से एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के रूप में जानी जाती हैं। जो कभी हमारे अखंड भारत देश का भाग थी। पाकिस्तान के जनक जिन्ना का नाम कौन नहीं जानता। जिन्ना को अलग पाकिस्तान बनाने का पाठ पढ़ाने वाला अगर कोई था तो वो थासर मुहम्मद इक़बाल। मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी हिन्दू थे। उनका नाम था तेज बहादुर सप्रु। उस समय कश्मीर पर अफगान गवर्नर अज़ीम खान का राज था। तेज बहादुर सप्रु खान के यहाँ पर राजस्व विभाग में कार्य करते थे। उन पर घोटाले का आरोप लगा। उनके समक्ष दो विकल्प रखे गए। पहला था मृत्युदंड का विकल्प दूसरा था इस्लाम स्वीकार करने का विकल्प। उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण कर लिया। और अपने नाम बदल कर स्यालकोट आकर रहने लगे[v]। इसी निर्वासित परिवार में मुहम्मद इक़बाल का जन्म हुआ था। कालांतर में यही इक़बाल पाकिस्तान के जनक जिन्ना का मार्गदर्शक बना।

मुहम्मद अली जिन्ना गुजरात के खोजा राजपूत परिवार में हुआ था। कहते हैं उनके पूर्वजों को इस्लामिक शासन काल में पीर सदरुद्दीन ने इस्लाम में दीक्षित किया था। इस्लाम स्वीकार करने पर भी खोजा मुसलमानों का चोटी, जनेऊ आदि से प्रेम दूर नहीं हुआ था। इस्लामिक शासन गुजर जाने पर खोजा मुसलमानों की द्वारा भारतीय संस्कृति को स्वीकार करने की उनकी वर्षों पुरानी इच्छा फिर से जाग उठी। उन्होंने उस काल में भारत की आध्यात्मिक राजधानी बनारस के पंडितों से शुद्ध होने की आज्ञा मांगी। हिन्दुओं का पुराना अपच रोग फिर से जाग उठा। उन्होंने खोजा मुसलमानों की मांग को अस्वीकार कर दिया। इस निर्णय से हताश होकर जिन्ना के पूर्वजों ने बचे हुए हिन्दू अवशेषों को सदा के लिए तिलांजलि दे दी। एवं उनका मन सदा के लिए हिन्दुओं के प्रति द्वेष और घृणा से भर गया। इसी विषाक्त माहौल में उनके परिवार में जिन्ना का जन्म हुआ। जो स्वाभाविक रूप से ऐसे माहौल की पैदाइश होने के कारण पाकिस्तान का जनक बना[vi]। अगर हिन्दू पंडितों ने शुद्ध कर अपने से अलग हुए भाइयों को मिला लिया होता तो आज देश की क्या तस्वीर होती। पाठक स्वयं अंदाजा लगा सकते है।

अगर सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में ऐसी ऐसी अनेक भूलों को जाना जायेगा तो मन व्यथित होकर खून के आँसू रोने लगेगा। संसार के मागर्दर्शक, प्राचीन ऋषियों की यह महान भारत भूमि आज किन हालातों में हैं, यह किसी से छुपा नहीं हैं। क्या हिन्दुओं का अपच रोग इन हालातों का उत्तरदायी नहीं हैं? आज भी जात-पात, क्षेत्र- भाषा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा आदि के आधार पर विभाजित हिन्दू समाज क्या अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस मिलाने की पाचक क्षमता रखता हैं? यह एक भीष्म प्रश्न है? क्यूंकि देश की सम्पूर्ण समस्यायों का हल इसी अपच रोग के निवारण में हैं।

एक मुहावरा की "बोये पेड़ बबुल के आम की चाहत क्यों" भारत भूमि पर सटीक रूप से लागु होती हैं।

डॉ विवेक आर्य

सन्दर्भ

[i] भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 91

संस्‍कृति के चार अध्‍याय: रामधारी सिंह दिनकर

पाकिस्‍तान का आदि और अंत: बलराज मधोक

[ii] राजतरंगिणी,जोनाराज पृष्ठ 152-155

[iii] राजतरंगिणी, जोनराजा पृष्ठ 20-21

[iv] व्यथित कश्मीर; नरेंदर सहगल पृष्ठ 59

[v] R.K. Parimu, the author of History of Muslim Rule in Kashmir, and Ram Nath Kak, writing in his autobiography, Autumn Leaves

[vi] युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे- वीरेंदर संधु। वीरेंदर संधु अमर बलिदानी भगत सिंह जी की भतीजी है

Swami Narayan Temple, Georgia, Atlanta, USA

विदेशों की धरती पर  ऐसे मंदिर देखकर यह विश्वास हो गया औऱ सीना गर्व से चोडा हो गया... कि सनातन धर्म को मिटाना इतना आसान नहीं होगा..


(BAPS स्वामीनारायण मंदिर अटलांटा, जॉर्जिया )
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Kailash Mandir , Ellora, Maharashtra




Kailash Mandir, Ellora, Maharashtra

कैलाश मंदिर की वास्तुकला और शिल्पकला को जो आज पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है

महाराष्ट्र के एलोरा में कैलाश मंदिर आधुनिक टेक्नोलॉजी के लिए एक बड़ा रहस्य है. कई प्राचीन हिन्दू मंदिरों की तरह इस मंदिर में कई आश्चर्यजनक बातें हैं जोकि हमें हैरान करती हैं | शिव का यह दोमंजिला मंदिर पर्वत की ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है।एलोरा का कैलाश मन्दिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में प्रसिद्ध ‘एलोरा की गुफ़ाओं’ में स्थित है। यह मंदिर दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

# दुनिया में एक मात्र मंदिर है जिसे उपर से नीचे की तरफ़ चट्टान को काटकर निकाला गया है. बाक़ी सभी चट्टानो के निर्माण को सामने से काटकर बनाया गया है. ये दुनिया का सबसे बड़ा मोनोलिथिक चट्टान का निर्माण है

# इस मंदिर के निर्माण के सही समय का किसी को नहीं पता पर ये चट्टाने यहाँ 6000 साल से है , इन चट्टानों को काटकर कब ये मंदिर बनाया गया ये आज भी एक रहस्य है

# ये मंदिर बहुत गहन डिज़ाइन और मेज़र्मेंट की अद्भुत मिसाल है जिसमें शिल्पकार के लिये गलती की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि एक बार कोई पत्थर ग़लत कट गया तो फिर उसे जोड़ा नहीं जा सकता क्यूँकि ये एक अकेली चट्टान को काटकर बनाया गया है 

# इतिहासकारों कारों के अनुसार इसे 18 वर्षों की अवधि में बनाया गया , सोचो उस काल में 4 लाख टन भारी चट्टानों को कुरेदा गया केवल औसत औज़ारों से , वे 4 लाख टन चट्टाने भी अब कही आस पास नहीं है ये भी एक रहस्य है

# कुछ शोधकर्ताओं का दावा है कि अपनी तरह की ये आधुनिक संरचना को आज भी मॉर्डन तकनीक का इस्तेमाल करके बनाना मानव के लिए असम्भव है और उनके अनुसार ये काम हमसे कही जादा आधुनिक सभ्यता अथवा पारलौकिक जीवों का है लेकिन मानव का नहीं 

# कुछ शोधकर्ताओं का बहुत ठोस दावा है की इस मदिर  के गर्भग्रह में एक भूमिगत सभ्यता का अस्तित्व है..इसमें कई सारी ग़हरी सुरंग है जिसको प्रतिबंधित किया गया है और उन्मे ताले लगे है.

# यहाँ तक 1682 में औरंगज़ेब ने इस मंदिर को तोड़ने के लिए 1000 लोगों को 3 साल तक लगाए रखा लेकिन वे मंदिर को केवल नाममात्र का ही नुक़सान पहुँचा पाए उसके बाद हारकर औरंगज़ेब ने मंदिर को वैसे ही छोड दिया...ये मंदिर औरंगाबाद में ही है जो औरंगज़ेब के नाम पर रखा गया है
....आश्चर्य की बात ये है की  ऐसी अलौकिक संरचना विश्व के अजूबों में शामिल नहीं है...

ऐसा मंदिर बनाने के लिए :-
आज के समय ऐसा मंदिर बनाने के लिए सैकड़ों ड्राइंगस, 3D डिजाईन सॉफ्टवेयर, CAD सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स बनाकर उसकी रिसर्च, सैकड़ों इंजीनियर, कई हाई क्वालिटी कंप्यूटरर्स की आवश्यकता पड़ेगी. उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? कोई जवाब नहीं हमारे पास. सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज इन सब आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके भी शायद ऐसा दूसरा मन्दिर बनाना असम्भव ही है ।

बहुत से रहस्य छुपे है रहस्यमयी अस्तित्व के स्वामी भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर में 
हर हर महादेव

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